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ছোট গল্প

 

একাকী বৃদ্ধের জীবন ও একটি বিশেষ বন্ধু

​শহরের এক কোণে, একাকী বৃদ্ধ মিস্টার রহমান তার ছোটো এবং সাজানো ফ্ল্যাটে বাস করতেন। তার স্ত্রী দীর্ঘদিন আগে চলে গেছেন এবং তার সন্তানেরা বিদেশে থাকেন। মিস্টার রহমানের একমাত্র সঙ্গী ছিল তার কুকুর, একটি ছোটো, গোল গোল লোমের স্প্যানিয়েল যার নাম ছিল টফি। তারা দুজনে একসাথে সব কিছু করতেন।

​প্রতিদিন বিকেলে, মিস্টার রহমান ও টফি পার্কে হাটার জন্য বের হতেন। পার্কের অন্যান্য কুকুর ও তাদের মালিকরা টফি ও মিস্টার রহমানের বন্ধুত্বের কথা জানতে পেরে তাদের প্রতি খুবই সহানুভূতিশীল হয়ে উঠেছিলেন। মিস্টার রহমানের সাথে টফি তার আনন্দ ও বিষাদের মুহূর্তগুলি শেয়ার করতে শুরু করল। তাদের বন্ধুত্ব ধীরে ধীরে একটি অনন্য ধরণের সম্পর্কে পরিণত হল।


​একদিন বিকেলে মিস্টার রহমান পার্কের একটি বেঞ্চে বসে ছিলেন, টফি তার পাশে বসে ছিল। তিনি একটি পুরানো ছবি দেখছিলেন এবং তার চোখের কোণায় জল এসে পড়েছিল। ছবিটিতে তার স্ত্রী এবং তাদের যুবকদের একটি ছবি দেখা যাচ্ছিল। টফি তার দিকে গভীর মনোযোগ দিয়ে দেখছিল এবং বুঝতে পেরেছিল যে তার বন্ধু খুব দুঃখী।

​টফি তার সামনে এগিয়ে এসে, তার মুখটি মিস্টার রহমানের হাতের উপর রেখে, তার পাশে বসে পড়ল। তার গোল চোখ দিয়ে মিস্টার রহমানের দিকে তাকিয়ে, সে যেন কিছু বলতে চেয়েছিল। মিস্টার রহমান তার দিকে তাকিয়ে, মুচকি হেসেছিলেন। তিনি ছবিটিকে আলতোভাবে চুমু দিয়ে, পকেটে রেখে দিয়েছিলেন। মিস্টার রহমান এবং টফি এরপর পার্কে তাদের প্রতিদিনের হাঁটা চালিয়ে গেলেন। সূর্য অস্ত যাওয়ার সাথে সাথে তাদের পথ চলতে দেখা যাচ্ছিল। একটি নতুন জীবন শুরু হয়েছিল।

कंचनजंगा Kanchenjunga की यात्रा

 कंचनजंगा (Kanchenjunga) दुनिया की तीसरी और भारत की सबसे ऊंची चोटी है। इसकी यात्रा (ट्रेक या टूर) प्रकृति प्रेमियों और एडवेंचर के शौकीनों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। कंचनजंगा की यात्रा मुख्य रूप से दो तरीकों से की जा सकती है: कंचनजंगा बेस कैंप ट्रेक (एडवेंचर के लिए) और सिक्किम/दार्जिलिंग टूर (साइटसीइंग के लिए)।

यहाँ इस यात्रा से जुड़ी पूरी जानकारी दी गई है:

 1. कंचनजंगा बेस कैंप ट्रेक (Kanchenjunga Base Camp Trek)

यदि आप एक अनुभवी ट्रैकर हैं और पहाड़ों को करीब से देखना चाहते हैं, तो यह ट्रेक आपके लिए है। यह ट्रेक भारत (सिक्किम) और नेपाल दोनों तरफ से होता है, लेकिन भारत में सिक्किम का ग्रीन लेक ट्रेक या गोएचा ला पास ट्रेक (Goecha La Trek) सबसे प्रसिद्ध हैं, जहाँ से कंचनजंगा का भव्य रूप दिखता है।

 अवधि: 10 से 12 दिन (ट्रेक के रूट के आधार पर)

 कठिनाई का स्तर: कठिन (Extremely Challenging)

 अधिकतम ऊंचाई: लगभग 4,940 मीटर (गोएचा ला)

 मुख्य आकर्षण: कंचनजंगा का दक्षिण मुख (South Face), तीस्ता नदी का उद्गम, अल्पाइन जंगल, और रंग-बिरंगे रोडोडेंड्रोन (बुरांश) के फूल।

 2. कंचनजंगा दर्शन टूर (Kanchenjunga Sightseeing Tour)

अगर आप ट्रेकिंग नहीं करना चाहते और परिवार के साथ आराम से कंचनजंगा की चोटियों का दीदार करना चाहते हैं, तो आप सिक्किम और पश्चिम बंगाल के इन हिल स्टेशंस पर जा सकते हैं:

 टाईगर हिल (दार्जिलिंग): यहाँ से सुबह के समय कंचनजंगा पर पड़ने वाली सूरज की पहली किरणें (गोल्डन व्यू) देखना एक जादुई अनुभव होता है।

 पेलिंग (पश्चिम बंगाल/सिक्किम सीमा के पास): सिक्किम का यह खूबसूरत शहर कंचनजंगा के सबसे करीब और साफ व्यू देने के लिए जाना जाता है।

 गंगटोक (तशी व्यू पॉइंट): सिक्किम की राजधानी से भी मौसम साफ होने पर कंचनजंगा की बर्फ़ीली चोटियां साफ नजर आती हैं।

 रवांगला (बुद्ध पार्क): यहाँ विशाल बुद्ध प्रतिमा के पीछे कंचनजंगा के पहाड़ बैकग्राउंड की तरह चमकते हैं।

 📅 यात्रा का सबसे अच्छा समय (Best Time to Visit)

कंचनजंगा की यात्रा के लिए साल में दो सबसे बेहतरीन मौसम होते हैं:

| मौसम | महीना | खासियत |


| वसंत ऋतु (Spring) | मार्च से मई | इस समय मौसम सुहावना होता है और रास्ते में बुरांश (Rhododendron) के फूल खिले होते हैं। |

| शरद ऋतु (Autumn) | अक्टूबर से नवंबर | मानसून के ठीक बाद आसमान बिल्कुल साफ होता है, जिससे पहाड़ों का सबसे स्पष्ट व्यू मिलता है। |

> ⚠️ नोट: मानसून (जून से सितंबर) और अत्यधिक ठंड (दिसंबर से फरवरी) के दौरान यहाँ जाने से बचें, क्योंकि भूस्खलन और भारी बर्फबारी के कारण रास्ते बंद हो जाते हैं।

 📍 यात्रा कैसे शुरू करें? (How to Reach)

कंचनजंगा (सिक्किम/दार्जिलिंग) पहुँचने के लिए मुख्य पड़ाव निम्नलिखित हैं:

 हवाई मार्ग (By Air): सबसे नजदीकी हवाई अड्डा बागडोगरा (Bagdogra - IXB) है जो पश्चिम बंगाल में है। सिक्किम के लिए आप पाकयोंग (Pakyong) एयरपोर्ट भी देख सकते हैं (मौसम पर निर्भर)।

 रेल मार्ग (By Train): सबसे नजदीकी बड़ा रेलवे स्टेशन न्यू जलपाईगुड़ी (NJP) है।

 आगे का सफर: बागडोगरा या NJP से आप शेयरिंग या प्राइवेट टैक्सी लेकर दार्जिलिंग (3 घंटे) या गंगटोक (4-5 घंटे) पहुँच सकते हैं।

 🛂 आवश्यक अनुमतियाँ (Permits)

चूंकि कंचनजंगा का इलाका अंतरराष्ट्रीय सीमाओं (नेपाल, चीन, भूटान) के करीब है, इसलिए यहाँ यात्रा के लिए विशेष परमिट की आवश्यकता होती है:

 भारतीय नागरिकों के लिए: सिक्किम के कुछ हिस्सों (जैसे नॉर्थ सिक्किम या ट्रेकिंग रूट्स) के लिए Innate Line Permit (ILP) या स्थानीय पुलिस अथॉरिटी से पास लेना होता है।

 विदेशी नागरिकों के लिए: Restricted Area Permit (RAP) की आवश्यकता होती है।

क्या आप कंचनजंगा की इस यात्रा को एक रोमांचक ट्रेक के रूप में प्लान कर रहे हैं 


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চঞ্চল কাঠবিড়ালি.....ছোটদের গল্পঃ

 এক যে ছিল ছোট্ট কাঠবিড়ালি, তার নাম টিংকু। টিংকু দেখতে যেমন মিষ্টি, তেমনি ছিল চঞ্চল। সারাদিন এ-ডাল থেকে ও-ডালে লাফিয়ে বেড়ানো আর নতুন নতুন জিনিস খুঁজে বেড়ানোই ছিল তার কাজ।

তবে টিংকুর একটা ছোট্ট সমস্যা ছিল—সে কোনো জিনিস গুছিয়ে রাখতে পারত না। মা প্রতিদিন বলতেন, "টিংকু, নিজের খাবার আর খেলনাগুলো একটু গুছিয়ে রাখো। পরে কিন্তু খুঁজে পাবে না।" টিংকু মায়ের কথা এক কান দিয়ে ঢুকিয়ে অন্য কান দিয়ে বের করে দিত। সে বলত, "ধুর মা! পরে দেখা যাবে।"

দেখতে দেখতে বনের মধ্যে শীত চলে এলো। গাছের সব পাতা ঝরে গেল, আর চারপাশটা কুয়াশায় ঢেকে গেল। শীতের দিনে বনের পশুপাখিরা সাধারণত বাইরে বের হয় না, তারা আগে থেকে জমিয়ে রাখা খাবার খেয়ে কোটরে বসে গল্প করে।

টিংকুরও খুব খিদে পেল। সে তার ছোট্ট কোটরের কোণায় খাবার খুঁজতে গেল। কিন্তু একি! সেখানে মাত্র দুটো শুকনো বাদাম পড়ে আছে! অথচ সারা গ্রীষ্ম আর বর্ষা জুড়ে সে কত কত ফল আর বাদাম কুড়িয়ে এনেছিল।

টিংকু কপালে হাত দিয়ে ভাবল, "আমার বাকি বাদামগুলো গেল কোথায়?"

সে কোটরের সব খড়কুটো ওলটপালট করল, কিন্তু কোথাও কিছু নেই। আসলে সে যখনই যা খাবার নিয়ে আসত, যেখানে-সেখানে ফেলে রাখত। কোনোটা হয়তো খাটের নিচে চলে গেছে, কোনোটা কোটরের ফুটো দিয়ে নিচে পড়ে গেছে।

খিদেয় টিংকুর পেট চুঁইচুঁই করছে। সে মন খারাপ করে কোটরের দরজায় বসে রইল। ঠিক তখন পাশ দিয়ে যাচ্ছিল তার বন্ধু মিন্টু। মিন্টু হলো একটা ছোট্ট ইঁদুর। মিন্টুর মুখে একটা মস্ত বড় মিষ্টি ফল।

টিংকুকে উদাস মুখে বসে থাকতে দেখে মিন্টু থামল। সে জিজ্ঞেস করল, "কী রে টিংকু! শীতের সকালে এমন মুখ শুকিয়ে বসে আছিস কেন? খাবার খাসনি?"

টিংকু কেঁদে ফেলে বলল, "আমি সারা বছর কত খাবার এনেছি, কিন্তু এখন একটাও খুঁজে পাচ্ছি না। সব হারিয়ে গেছে। আমার খুব খিদে পেয়েছে, মিন্টু।"

মিন্টু মুচকি হাসল। সে তার ফলটা টিংকুর দিকে এগিয়ে দিয়ে বলল, "এই নে, আর্ধেকটা তুই খা। আর শোন, তোর খাবার হারায়নি। তুই আসলে সেগুলো গুছিয়ে রাখিসনি বলে খুঁজে পাচ্ছিস না। চল, তোর কোটরটা আজ দুজনে মিলে একটু খুঁজি।"


দুই বন্ধু মিলে টিংকুর কোটর পরিষ্কার করতে শুরু করল। আর তখনই ঘটল ম্যাজিক!

  বিছানার তলা থেকে বেরোলো চারটে বড় বাদাম।

  দরজার কোণায় শুকনো পাতার নিচে লুকিয়ে ছিল একমুঠো কিশমিশ।

  এমনকি টিংকুর খেলনা গাড়ির ভেতরেও পাওয়া গেল দুটো শুকনো ফল!

সব খাবার একসঙ্গে জড়ো করে টিংকু দেখল, বাহ্! অনেক খাবার তো!

টিংকু লজ্জিত হয়ে বলল, "মা ঠিকই বলতেন। গুছিয়ে রাখলে কোনো জিনিস হারায় না, আর বিপদের সময় কষ্টও পেতে হয় না।"

> গল্পের শিক্ষা: নিজের জিনিসপত্র সবসময় গুছিয়ে রাখা উচিত। গোছানো স্বভাব থাকলে প্রয়োজনের সময় কোনো কিছু খুঁজতে হয় না এবং কষ্ট পেতে হয় না।

সেই থেকে টিংকু বনের সবচেয়ে লক্ষ্মী আর গোছানো কাঠবিড়ালি হয়ে গেল। এখন সে খাবার এনেই সুন্দর করে সারিবদ্ধভাবে সাজিয়ে রাখে।


গোয়েন্দা গল্প ....কুয়াশার ওপারে

 কুয়াশার ওপারে

সেদিন সন্ধে থেকেই কলুটোলার পুরোনো চারতলা বাড়িটার চারপাশ কুয়াশায় ঢেকে গিয়েছিল। ঘড়িতে তখন ঠিক রাত নটা। বিখ্যাত বেসরকারি গোয়েন্দা অনিমেষ চ্যাটার্জি তাঁর আরামকেদারায় বসে পাইপে শেষ টানটা দিচ্ছেন, এমন সময় দরজায় মৃদু টোকা পড়ল।

ভেতরে ঢুকলেন এক ভদ্রলোক। পরনে দামী কিন্তু কিছুটা কুঁচকানো স্যুট, চোখে চশমা, আর মুখে তীব্র আতঙ্কের ছাপ। ভদ্রলোক নিজের পরিচয় দিলেন—অরিন্দম বসু, শহরের নামী হিরে ব্যবসায়ী।

"আমায় বাঁচান মিস্টার চ্যাটার্জি," সোফায় বসতে বসতে বললেন অরিন্দমবাবু। "আমার জীবনের সবচেয়ে মূল্যবান জিনিস, 'নীল নক্ষত্র' হিরেটা আজ সন্ধেয় আমার সেফ থেকে চুরি হয়ে গেছে। আর আশ্চর্যের বিষয়, ঘরের দরজা-জানলা সব ভেতর থেকে বন্ধ ছিল!"

অনিমেষবাবু পাইপটা অ্যাশট্রেতে রেখে সোজা হয়ে বসলেন। তাঁর চোখ দুটো উজ্জ্বল হয়ে উঠল। "আকর্ষণীয়! বন্ধ ঘরের রহস্য। তা, ঘটনার সময় বাড়িতে কে কে ছিল?"

"শুধু আমার তিনজন বিশ্বস্ত মানুষ," অরিন্দমবাবু বললেন। "আমার ব্যক্তিগত সেক্রেটারি সমীর, বহুদিনের পুরোনো রাঁধুনি হরিপদ, আর আমার ভাগ্নে বিক্রম। আমি ছাড়া সেফের কোড আর কেউ জানে না। অথচ সেফটা কোনো ভাঙচুর ছাড়াই খোলা হয়েছে!"

 ঘটনাস্থলে অনিমেষ

আধ ঘণ্টার মধ্যে অনিমেষবাবু তাঁর সহকারী তরুণকে নিয়ে অরিন্দমবাবুর আলিপুরের বাংলোয় পৌঁছালেন। দোতলার সেই ঘরটি নিপুণভাবে পরীক্ষা করতে লাগলেন অনিমেষ।

 সেফ: ঘরের কোণে রাখা লোহার সেফটি একদম অক্ষত, কোনো আঁচড়ের দাগ নেই।

 জানলা: ভেতরের ছিটকিনি শক্ত করে আটকানো।

 মেঝে: ঘরের কার্পেটে হালকা কাদার দাগ, যা বাইরের জুতো থেকে আসতে পারে।

অনিমেষবাবু তিন সন্দেহভাজনকে একে একে জেরা করতে ডাকলেন।

১. হরিপদ (রাঁধুনি): "বাবু, আমি রাত আটটা থেকে সাড়ে আটটা পর্যন্ত নিচে রান্নাঘরে রুটি বেলছিলাম। ওপরতলায় কে এসেছে আমি জানি না।"

২. সমীর (সেক্রেটারি): "আমি পাশের ঘরে বসে ল্যাপটপে আগামী সপ্তাহের হিসেব মেলাচ্ছিলাম। কারেন্ট চলে যাওয়ার পর আমি একটা মোমবাতি জ্বালিয়ে কাজ করছিলাম।"

৩. বিক্রম (ভাগ্নে): "আমি আমার ঘরে বসে হেডফোন লাগিয়ে গান শুনছিলাম আর মোবাইলে গেম খেলছিলাম। কোনো আওয়াজ পাইনি।"

 সত্যের সন্ধান

সব শুনে অনিমেষবাবু ঘরের ব্যালকনিতে গিয়ে দাঁড়ালেন। বাইরে তখনও টিপটিপ বৃষ্টি আর কুয়াশা। হঠাতই ঘরের টেবিলের ওপর রাখা একটা ডায়েরির দিকে তাঁর চোখ গেল। ডায়েরির পাতাগুলো ওল্টাতে ওল্টাতে তিনি মুচকি হাসলেন।

"তরুণ, কেস খতম," অনিমেষবাবু বললেন। "অপরাধী নিজেই নিজের ফাঁদ পেতেছে।"

অনিমেষবাবু ড্রয়িংরুমে সবাইকে ডাকলেন। অরিন্দমবাবু অধীর আগ্রহে তাকিয়ে আছেন।

"মিস্টার বসু," অনিমেষবাবু বলতে শুরু করলেন, "চোর বাইরের কেউ নয়। আর সেফ খোলার জন্য কোড চুরি করারও প্রয়োজন পড়েনি। অপরাধী চাবি বা কোড ছাড়াই হিরেটা সরিয়েছে, কারণ সেফটি আসলে খোলাই ছিল!"

সবাই চমকে উঠল।

"মানে?" অরিন্দমবাবু অবাক।

"আজ বিকেল ৫টায় ব্যাংক থেকে ফেরার পর আপনি যখন সেফে টাকা রাখছিলেন, তখন আপনার সেক্রেটারি সমীরবাবু আপনাকে কফি এনে দেন। ঠিক সেই সময় আপনার মোবাইলে একটা জরুরি ফোন আসে। আপনি ফোনে কথা বলতে বলতে ঘর থেকে বেরিয়ে যান, সেফটি লক করতে ভুলে যান। সমীরবাবু সেই সুযোগের অপেক্ষায় ছিলেন।"

সমীর ফ্যাকাশে মুখে বলল, "মিথ্যে কথা! আমি তো পাশের ঘরে মোমবাতি জ্বালিয়ে কাজ করছিলাম। কারেন্ট ছিল না।"

"ঠিক এখানেই তুমি ভুলটা করলে সমীরবাবু," অনিমেষবাবু ডায়েরিটা তুলে ধরলেন। "আজ সন্ধে ৭টা থেকে সাড়ে ৭টা পর্যন্ত এই এলাকায় লোডশেডিং ছিল, এটা ঠিক। কিন্তু তুমি বললে তুমি মোমবাতির আলোয় 'ল্যাপটপে' হিসেব মেলাচ্ছিলে। ল্যাপটপের তো নিজস্ব ব্যাটারি থাকে, তার জন্য মোমবাতির আলোর দরকার হয় না। আসলে তুমি কারেন্ট যাওয়ার অন্ধকারে মিস্টার বসুর ঘরে ঢুকে হিরেটা সরিয়ে নাও। আর তাড়াহুড়ো করে বেরোনোর সময় তোমার ভেজা জুতোর কাদার দাগ কার্পেটে লেগে যায়।"

সমীর আর নিজেকে ধরে রাখতে পারল না। সে হাঁটু গেঁড়ে বসে পড়ল। "আমায় ক্ষমা করুন স্যার, শেয়ার বাজারে আমার অনেক ঋণ হয়ে গিয়েছিল..."

রাত এগারোটা। বাংলোর বাইরে কুয়াশা আরও ঘন হয়েছে। গাড়িতে ওঠার আগে তরুণ জিজ্ঞেস করল, "আচ্ছা স্যার, সমীর যে ল্যাপটপে কাজ করার মিথ্যে অজুহাত দিচ্ছিল, সেটা তো বুঝলাম। কিন্তু সেফ যে খোলাই ছিল, সেটা আপনি কী করে জানলেন?"

অনিমেষবাবু হেসে বললেন, "খুব সোজা, তরুণ। অরিন্দমবাবুর সেফটি ডিজিটাল। ওটা যদি ভুল কোড দিয়ে বা জোর করে খোলার চেষ্টা হতো, তবে স্বয়ংক্রিয় অ্যালার্ম বেজে উঠত। আর যদি সঠিক কোড দিয়ে খোলা হতো, তবে মিস্টার বসুর মোবাইলে একটা ওটিপি বা নোটিফিকেশন আসত। তার কিছুই হয়নি। তার মানে, সেফটি আগেই লক করা হয়নি। অতি সাবধানী মানুষও কখনো কখনো অমনোযোগী হয়ে পড়ে, আর চোরেরা ঠিক সেই মুহূর্তটারই খোঁজ করে।"

গাড়ি স্টার্ট নিল। অনিমেষবাবু আবার তাঁর পাইপটা ধরালেন, আর ধোঁয়ার কুন্ডলী বাংলোর কুয়াশায় মিশে গেল।


बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर (Deoghar) की यात्रा

 श्रावण मास (सावन) की शुरुआत होने वाली है और यदि आप भी बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर (Deoghar) की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो यह एक बेहद पवित्र और यादगार अनुभव होने वाला है। देवघर भारत के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है, जहां भगवान शिव का द्वादश ज्योतिर्लिंग (12 ज्योतिर्लिंगों में से एक) स्थापित है।

आपकी यात्रा को आसान और सुव्यवस्थित बनाने के लिए यहां एक कंप्लीट टूर गाइड दी गई है:

 प्रमुख दर्शनीय स्थल (Places to Visit)

 बाबा बैद्यनाथ मंदिर: यह यहां का मुख्य आकर्षण है। इसी परिसर में माता पार्वती का भी मंदिर है, जो एक शक्तिपीठ है। दोनों मंदिरों के शिखरों को एक लाल गठबंधन से जोड़ा गया है, जो बेहद पवित्र माना जाता है।

 बासुकीनाथ मंदिर: देवघर से लगभग 43 किमी दूर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि बाबा बैद्यनाथ के दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाते जब तक आप बासुकीनाथ के दर्शन नहीं कर लेते।

 त्रिकूट पर्वत: देवघर से 21 किमी दूर, यह तीन चोटियों वाला एक खूबसूरत पर्वत है। यहां ट्रेकिंग और प्रकृति का आनंद लिया जा सकता है।

 तपोवन: यह एक शांत गुफा स्थल है जहां माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने तपस्या की थी।

 नौलखा मंदिर: बाबा मंदिर से थोड़ी दूरी पर स्थित यह राधा-कृष्ण का एक बेहद खूबसूरत मंदिर है, जिसके निर्माण में उस समय (1940 के दशक में) 9 लाख रुपये की लागत आई थी।

 देवघर कैसे पहुंचें? (How to Reach)

 हवाई मार्ग (By Air): देवघर में अपना खुद का एयरपोर्ट (Deoghar Airport - DGH) है, जो दिल्ली, कोलकाता और रांची जैसे प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

 रेल मार्ग (By Train): मुख्य रेलवे स्टेशन जसडीह जंक्शन (JSME) है, जो देवघर से मात्र 7-8 किमी दूर है। यह हावड़ा-दिल्ली मुख्य लाइन पर स्थित है, इसलिए यहां के लिए देश के हर बड़े हिस्से से ट्रेनें मिल जाती हैं।

 सड़क मार्ग (By Road): देवघर, रांची (250 किमी) और पटना (230 किमी) से सड़क मार्ग द्वारा अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

 यात्रा का सबसे अच्छा समय (Best Time to Visit)

 अक्टूबर से मार्च: यदि आप शांति से दर्शन करना चाहते हैं और मौसम का आनंद लेना चाहते हैं, तो सर्दियों का समय सबसे बेस्ट है।

 श्रावण मास (जुलाई-अगस्त): यदि आप 'विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला' देखना चाहते हैं, तो सावन के महीने में आएं। इस समय लाखों 'कांवरिया' सुल्तानगंज (बिहार) से गंगाजल लेकर 105 किमी पैदल यात्रा करके बाबा को जल चढ़ाने आते हैं। *ध्यान दें: इस समय बहुत भारी भीड़ होती है।*

 रहने और खाने की व्यवस्था (Stay & Food)

 रुकने के लिए: बाबा मंदिर के पास कई धर्मशालाएं, बजट होटल और होटल उपलब्ध हैं। सावन के महीने में आने से पहले एडवांस बुकिंग जरूर करा लें।

 भोजन: देवघर में शुद्ध शाकाहारी भोजन आसानी से मिल जाता है। यहां का "पेड़ा" (Deoghar Peda) विश्व प्रसिद्ध है, जिसे बाबा के प्रसाद के रूप में भी चढ़ाया जाता है।

> यात्रा के लिए विशेष टिप: यदि आप सावन या किसी त्योहार के दौरान आ रहे हैं, तो बाबा मंदिर में जल चढ़ाने के लिए लंबी कतारों से बचने के लिए आप 'शीघ्रदर्शनम' (VIP पास्स) टिकट भी ले सकते हैं, जो मंदिर प्रशासन द्वारा काउंटर या ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाता है।



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