नींबू का अचार

 गर्मियों के मौसम में धूप में तैयार किया गया नींबू का अचार (Lemon Pickle) न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाता है, बल्कि यह पाचन के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। यहाँ पारंपरिक और आसान तरीके से बिना तेल वाला खट्टा-मीठा या चटपटा नींबू का अचार बनाने की रेसिपी दी गई है।

 सामग्री (Ingredients)

  •   नींबू: 1 किलो (कागज़ी या पतले छिलके वाले)
  •  नमक: 150 ग्राम (लगभग 1/2 कप)
  •  काला नमक: 2 बड़े चम्मच
  •  अजवाइन: 2 बड़े चम्मच
  •  लाल मिर्च पाउडर: 2 बड़े चम्मच (तीखेपन के लिए)
  •  कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर: 1 बड़ा चम्मच (अच्छे रंग के लिए)
  •  गरम मसाला: 1 छोटा चम्मच
  •  हल्दी पाउडर: 1 छोटा चम्मच
  •  चीनी या गुड़ (वैकल्पिक): 200 ग्राम (यदि खट्टा-मीठा अचार चाहिए)

बनाने की विधि (Step-by-step Recipe)

 1. नींबू की तैयारी

  नींबू को अच्छी तरह धोकर सूती कपड़े से पोंछ लें। ध्यान रहे, नींबुओं पर बिल्कुल भी नमी या पानी नहीं होना चाहिए, नहीं तो अचार खराब हो सकता है।

  एक नींबू के अपनी पसंद के अनुसार 4 या 8 टुकड़े कर लें। काटते समय जो बीज आसानी से निकलें, उन्हें निकाल दें।

 2. नमक लगाना (पहला चरण)

  कटे हुए नींबुओं को एक बड़े कांच या प्लास्टिक के बर्तन में डालें।

  इसमें सफेद नमक और हल्दी पाउडर डालकर अच्छी तरह मिलाएँ।

  अब इसे एक साफ, सूखे कांच के जार (Glass Jar) में भरकर 4 से 5 दिनों के लिए धूप में रख दें। रोज़ाना जार को एक बार हिलाएं। इससे नींबू का छिलका मुलायम हो जाएगा और वह रस छोड़ देगा।

 3. मसाले मिलाना (दूसरा चरण)

  5 दिन बाद, जब नींबू थोड़े गल जाएं, तो उन्हें जार से एक साफ बर्तन में निकालें।

  अब इसमें अजवाइन (हल्का सा क्रश करके), काला नमक, लाल मिर्च पाउडर, कश्मीरी मिर्च और गरम मसाला डालें।

 खट्टे-मीठे स्वाद के लिए: अगर आप खट्टा-मीठा अचार चाहते हैं, तो इसी समय इसमें चीनी या गुड़ का पाउडर भी मिला दें।

 4. धूप में पकाना

  मसालों को अच्छी तरह मिलाने के बाद, अचार को वापस कांच के जार में भर दें।

  जार के मुंह पर एक सूती कपड़ा बांधकर इसे 10 से 15 दिनों के लिए धूप में रखें।

  हर दिन चम्मच से या जार को हिलाकर अचार को ऊपर-नीचे करते रहें।

महत्वपूर्ण टिप्स (Pro Tips)

> बर्तन और चम्मच: अचार बनाने और निकालने के लिए हमेशा पूरी तरह सूखे कांच या प्लास्टिक के बर्तनों का ही इस्तेमाल करें। स्टील या एल्युमिनियम के बर्तनों में नींबू का एसिड रिएक्शन कर सकता है।

> धूप की अहमियत: यह अचार बिना तेल का है, इसलिए इसे खराब होने से बचाने के लिए अच्छी धूप दिखाना बहुत ज़रूरी है।

> लाइफ शेल्फ: यह अचार जितना पुराना होता जाता है, इसका स्वाद उतना ही बढ़ता जाता है। यह सालों-साल खराब नहीं होता।

क्या आप पारंपरिक तीखा अचार बनाना पसंद करेंगे या चीनी वाला खट्टा-मीठा वर्ज़न?


आम का अचार

 आम का अचार भारतीय घरों की शान है। गर्मियों के मौसम में कच्चे आम (कैरी) से बना यह अचार साल भर तक खाने का स्वाद बढ़ाता रहता है।

यहाँ पारंपरिक और सबसे लोकप्रिय पंजाबी स्टाइल आम के अचार की आसान और लंबे समय तक चलने वाली रेसिपी दी गई है:

 🛒 आवश्यक सामग्री (Ingredients)

  •  कच्चे आम (कटे हुए): 1 किलोग्राम
  •  सरसों का तेल (Mustard Oil): 2 से 3 कप (अचार को डूबने के लिए)
  •  सौंफ (Fennel seeds): 4 बड़े चम्मच
  •  मेथी दाना (Fenugreek seeds): 2 बड़े चम्मच
  •  पीली या काली सरसों (Mustard seeds): 3 बड़े चम्मच (दरदरी पिसी हुई)
  •  कलौंजी (Nigella seeds): 1 बड़ा चम्मच
  •  हल्दी पाउडर: 2 बड़े चम्मच
  •  लाल मिर्च पाउडर: 2 से 3 बड़े चम्मच (तीखापन स्वादानुसार)
  •  कश्मीरी लाल मिर्च: 1 बड़ा चम्मच (बेहतरीन रंग के लिए)
  •  हींग (Asafoetida): 1/2 छोटा चम्मच
  •  नमक: 4 से 5 बड़े चम्मच (नमक प्रिजर्वेटिव का काम करता है, इसलिए थोड़ा ज्यादा डलता है)

 👩‍🍳 बनाने की विधि (Step-by-Step Recipe)

 स्टेप 1: आम को तैयार करना (सबसे जरूरी कदम)

 1. कच्चे आमों को अच्छे से धोकर पोंछ लें ताकि नमी बिल्कुल न रहे।

 2. इन्हें छोटे टुकड़ों में काट लें और गुठली निकाल दें।

 3. कटे हुए आमों में 1 चम्मच हल्दी और 2 चम्मच नमक मिलाकर 4-5 घंटे या रात भर के लिए रख दें। इससे आम का अतिरिक्त पानी निकल जाएगा।

 4. अगले दिन, इस पानी को छानकर अलग कर दें और आम के टुकड़ों को 3-4 घंटे के लिए धूप में या पंखे के नीचे कपड़े पर फैलाकर सुखा लें। *(नमी पूरी तरह खत्म होना जरूरी है ताकि अचार खराब न हो)*।

स्टेप 2: मसाला तैयार करना

 1. सौंफ और मेथी दाने को तवे पर हल्का सा भून लें (ड्राई रोस्ट) ताकि उनकी नमी निकल जाए और खुशबू आने लगे।

 2. इन्हें ठंडा करके मिक्सी में दरदरा (Coarse) पीस लें।

 3. एक बड़े बर्तन में यह दरदरा मसाला, पिसी हुई सरसों, कलौंजी, हल्दी, लाल मिर्च पाउडर, हींग और बचा हुआ नमक मिलाकर एक सूखा मिक्सचर तैयार कर लें।

स्टेप 3: तेल और मिक्सिंग

 1. सरसों के तेल को एक कड़ाही में तब तक गर्म करें जब तक कि उसमें से धुआं न निकलने लगे (इससे तेल का तीखापन कम होता है)। फिर गैस बंद करके तेल को पूरी तरह ठंडा होने दें।

 2. ठंडे हुए तेल में से आधा कप तेल सूखे मसाले के मिश्रण में डालें और अच्छी तरह मिला लें।

 3. अब इस मसाले में सूखे हुए आम के टुकड़े डालें और अच्छे से मिक्स करें ताकि हर टुकड़े पर मसाले की कोटिंग हो जाए।

स्टेप 4: मर्तबान में डालना और धूप दिखाना

 1. अचार को एक साफ, सूखे और कांच या चीनी मिट्टी के जार (बरनी) में भरें।

 2. अब ऊपर से बचा हुआ सारा सरसों का तेल डाल दें। **ध्यान रहे, अचार तेल में पूरी तरह डूबा होना चाहिए।**

 3. जार के मुंह पर एक साफ सूती कपड़ा बांधें और इसे 4-5 दिनों तक धूप में रखें। दिन में एक बार सूखे चम्मच से अचार को ऊपर-नीचे चला दें।

 🛡️ अचार को सालों-साल खराब होने से बचाने के टिप्स

>  पानी दुश्मन है: अचार बनाते समय, जार में, या निकालने के लिए इस्तेमाल होने वाले चम्मच में थोड़ा सा भी पानी नहीं होना चाहिए। हमेशा सूखे चम्मच का इस्तेमाल करें।

>  तेल का स्तर: अचार के ऊपर हमेशा तेल की एक परत तैरती रहनी चाहिए। तेल फंगस (उल्ली) लगने से बचाता है।

>  सिरके का इस्तेमाल (Optional): अगर आप तेल कम रखना चाहते हैं, तो मसाले मिलाते समय 2-3 बड़े चम्मच सफेद सिरका (White Vinegar) डाल दें। यह प्रिजर्वेटिव का काम करता है।

आपका तीखा, चटपटा और खुशबूदार आम का अचार तैयार है! इसे पराठे या दाल-चावल के साथ एन्जॉय करें।

क्या आप झटपट बनने वाले इंस्टेंट (तुरंत खाने वाले) आम के अचार की रेसिपी भी जानना चाहते हैं?


ভ্রমণ কাহিনী ...পাহাড় আর মেঘের মিতালী

 

পাহাড় আর মেঘের মিতালী: সাজেক ভ্যালির দিনলিপি

প্রকৃতির সান্নিধ্যে হারিয়ে যাওয়ার তীব্র আকাঙ্ক্ষা যখন মনের ভেতর দানা বেঁধে ওঠে, তখন শহরের ইট-পাথরের খাঁচা থেকে মুক্তি পাওয়ার কোনো বিকল্প থাকে না। এমনই এক ক্লান্তিকর সপ্তাহের শেষে আমরা সিদ্ধান্ত নিলাম—এবার যাব মেঘের দেশে, যেখানে হাত বাড়ালেই ছোঁয়া যায় নরম তুলোর মতো মেঘ। আমাদের গন্তব্য পাহাড়ের রানি, রাঙ্গামাটির ছাদখ্যাত সাজেক ভ্যালি।

 প্রথম পর্ব: মেঘের দেশে যাত্রা শুরু
ঢাকা থেকে রাতের বাসে চড়ে আমাদের যাত্রা শুরু হলো। উদ্দেশ্য খাগড়াছড়ি। ভোরের আলো ফুটতেই যখন আমরা খাগড়াছড়ি পৌঁছালাম, তখন চারপাশের পাহাড়ি ঠান্ডা হাওয়া আমাদের তন্দ্রাচ্ছন্ন ভাব নিমেষেই উড়িয়ে দিল।
সেখানে গরম-গরম পরোটা আর পাহাড়ি কলা দিয়ে প্রাতঃরাশ সেরে আমরা উঠে পড়লাম আমাদের রিজার্ভ করা 'চাঁদের গাড়ি'-তে (এক ধরণের খোলা জিপ)। সাজেক যাওয়ার আসল রোমাঞ্চ শুরু হয় এই চাঁদের গাড়ির সফর থেকেই।
```
আমাদের চাঁদের গাড়ি যখন আঁকাবাঁকা পাহাড়ি পথ ধরে এগিয়ে যাচ্ছিল, মনে হচ্ছিল আমরা যেন কোনো রোলার কোস্টারে চড়েছি!

```
দুই পাশে ঘন সবুজ পাহাড়, আর মাঝখান দিয়ে পিচঢালা কালো পথ সাপের মতো বয়ে গেছে। পথের দুপাশের জুম চাষ আর ছোট ছোট পাহাড়ি শিশুদের হাত নেড়ে স্বাগত জানানো আমাদের মনে এক অদ্ভুত ভালো লাগার জন্ম দিল। দীঘিনালা পার হওয়ার পর যখন আমাদের গাড়ি বাঘাইহাট আর্মি ক্যাম্পের এসকর্টে প্রবেশ করল, তখন রোমাঞ্চের মাত্রা যেন আরও দ্বিগুণ হয়ে গেল।


 দ্বিতীয় পর্ব: সাজেকে প্রবেশ ও মেঘের সমুদ্র
দুপুরের ঠিক আগে আমাদের চাঁদের গাড়ি এসে থামল সাজেক ভ্যালির রুইলুই পাড়ায়। গাড়ি থেকে নেমেই এক ঝলক হিমেল হাওয়া আমাদের স্বাগত জানাল। সমুদ্রপৃষ্ঠ থেকে প্রায় ১,৮০০ ফুট উঁচুতে অবস্থিত এই উপত্যকায় দাঁড়িয়ে চারপাশের পাহাড়ের সৌন্দর্য দেখে আমরা মুহূর্তের জন্য স্তব্ধ হয়ে গেলাম।


আমরা আগে থেকেই একটি কাঠের দোতলা রিসোর্ট বুক করে রেখেছিলাম। রিসোর্টের ব্যালকনি থেকে সরাসরি মিজোরামের পাহাড় শ্রেণী দেখা যায়। ফ্রেশ হয়ে দুপুরের পাহাড়ি বাঁশ দিয়ে রান্না করা বিখ্যাত 'ব্যাম্বু চিকেন' আর জুমের চালের ভাত দিয়ে তৃপ্তি সহকারে দুপুরের খাবার সারলাম।


 সূর্যান্তের মায়াজাল
বিকেলের দিকে আমরা গেলাম সাজেকের বিখ্যাত **হেলিপ্যাডে**। সেখান থেকে সূর্যাস্ত দেখার অনুভূতি ভাষায় প্রকাশ করার মতো নয়। পাহাড়ের খাঁজে খাঁজে যখন লাল সূর্যটা আস্তে আস্তে হারিয়ে যাচ্ছিল, তখন পুরো আকাশ জুড়ে কমলা, বেগুনি আর লাল রঙের এক অপার্থিব ক্যানভাস তৈরি হলো। চারপাশটা যেন এক নিস্তব্ধ শান্ত চাদরে ঢাকা পড়ে গেল।


 তৃতীয় পর্ব: কুয়াশা ও মেঘের মায়াবী ভোর
সাজেক ভ্রমণের আসল আকর্ষণ হলো এর ভোরবেলা। ভোর সাড়ে চারটায় অ্যালার্মের শব্দে ঘুম ভাঙতেই চাদর মুড়ি দিয়ে ছুটে গেলাম ব্যালকনিতে। বাইরের দৃশ্য দেখে মনে হলো আমরা কোনো রূপকথার রাজ্যে চলে এসেছি!
চারপাশে আর কোনো পাহাড় দেখা যাচ্ছে না। পুরো উপত্যকা জুড়ে কেবল সাদা মেঘের সমুদ্র। তুলোর মতো তুলতুলে মেঘের দল পাহাড়ের গা বেয়ে আছড়ে পড়ছে। কখনো কখনো সেই মেঘের স্রোত আমাদের ব্যালকনি গলিয়ে ঘরের ভেতরও ঢুকে পড়ছিল।
```
মনে হচ্ছিল আমরা মেঘের ওপর ভাসমান কোনো দ্বীপে দাঁড়িয়ে আছি। হাত বাড়ালেই মেঘের ঠান্ডা স্পর্শ পাওয়া যাচ্ছিল।

```
আস্তে আস্তে যখন পূর্ব আকাশে সোনালী সূর্য উঁকি দিল, তখন সেই সাদা মেঘের সাগরে রোদের আলো পড়ে মুক্তোর মতো চকচক করে উঠল। এই দৃশ্য দেখার পর জীবনের সমস্ত ক্লান্তি ও অবসাদ এক মুহূর্তে কর্পূরের মতো উড়ে গেল।


 চতুর্থ পর্ব: কংলাক পাহাড় জয়
সকালে পাহাড়ি গরম চা আর ডিম-খিচুড়ি খেয়ে আমরা রওনা হলাম কংলাক পাড়ার উদ্দেশ্যে। এটি সাজেক ভ্যালির সর্বোচ্চ চূড়া। কংলাক পাহাড়ে যাওয়ার পথটি বেশ খাড়া এবং কিছুটা কষ্টসাধ্য। তবে চূড়ায় ওঠার পর যে দৃশ্য চোখের সামনে ভেসে ওঠে, তার জন্য যেকোনো কষ্ট স্বীকার করা যায়।
কংলাক পাহাড়ের ওপর দাঁড়িয়ে পুরো সাজেক ভ্যালি এবং দূর সীমান্তের ভারতীয় পাহাড়গুলো এক নজরে দেখা যায়। সেখানে বসবাসকারী স্থানীয় 'লুসাই' সম্প্রদায়ের সরল জীবনযাত্রা আমাদের ভীষণভাবে আকৃষ্ট করল। পাহাড়ি নারীদের পিঠে ঝুড়ি নিয়ে জুমের ফসল তোলা এবং শিশুদের নিষ্পাপ হাসি মনের গভীরে এক গভীর প্রশান্তি এনে দেয়।
বিদায় সাজেক
দুই দিন দুই রাতের এই জাদুকরী সফর শেষ করে যখন আমরা আবার চাঁদের গাড়িতে চড়ে খাগড়াছড়ির দিকে ফিরছিলাম, তখন মনটা ভীষণ ভারী হয়ে উঠছিল। ফেলে আসছিলাম সেই মেঘের সমুদ্র, পাহাড়ি বাঁকের রোমাঞ্চ আর শান্ত, স্নিগ্ধ প্রকৃতিকে।
সাজেক আমাদের শুধু সুন্দর কিছু দৃশ্যই উপহার দেয়নি, বরং প্রকৃতির বিশালতার সামনে মানুষ কতটা ক্ষুদ্র—সেই সত্যটাও মনে করিয়ে দিয়ে গেল। যান্ত্রিক জীবনের কোলাহলে যখনই মন হাঁপিয়ে উঠবে, চোখ বন্ধ করলেই মনের কোণে ভেসে উঠবে সাজেকের সেই রূপালী মেঘের সমুদ্র।


ভ্রমণ টিপস:
 সাজেক একটি অত্যন্ত সংবেদনশীল পাহাড়ি অঞ্চল, তাই দয়া করে সেখানে প্লাস্টিক বা ময়লা ফেলে পরিবেশ নষ্ট করবেন না।


পাহাড়িদের সংস্কৃতি ও জীবনযাত্রাকে সম্মান করুন। অনুমতি ছাড়া তাদের ছবি তোলা থেকে বিরত থাকুন।

ছোট গল্প.....শেষ চিঠির অপেক্ষা

 

শেষ চিঠির অপেক্ষা

হরিপদবাবুর বয়স এখন পঁচাত্তর ছুঁইছুঁই। পিঠটা সামান্য ঝুঁকে গেছে, আর চোখের দৃষ্টিতে আগের সেই তীক্ষ্ণতা নেই। কিন্তু তাঁর স্মৃতির খাতাটা এখনও বেশ স্পষ্ট। জীবনের দীর্ঘ চল্লিশটি বছর তিনি এই গ্রামের ডাকপিয়ন হিসেবে কাজ করেছেন। কাঁধে একটা খাঁকি রঙের ব্যাগ ঝুলিয়ে, সাইকেলের বেল বাজিয়ে গ্রামের এ-মাথা থেকে ও-মাথা ছুটে বেড়ানোই ছিল তাঁর জীবন।
এখন তিনি অবসর নিয়েছেন প্রায় দশ বছর হতে চলল। কিন্তু প্রতিদিন বিকেলে এখনও তিনি এসে বসেন গ্রামের পুরোনো বকুলতলার চাতালে। তাঁর হাতে থাকে একটা জীর্ণ, হলদে হয়ে যাওয়া চিঠির খাম।
এই চিঠিটা তাঁর জীবনের এক অপূর্ণ দায়িত্ব, এক অমীমাংসিত রহস্য।
## ১. পুরোনো দিনের কথা
তখন হরিপদবাবুর চাকুরিজীবনের শুরুর দিক। সাইকেল চালিয়ে ধুলো উড়িয়ে তিনি ঘুরে বেড়াতেন। গ্রামে তখন চিঠির কদর ছিল অন্যরকম। কারও ভালো খবর, কারও কান্নার সুর—সবই বয়ে নিয়ে যেত তাঁর ওই খাঁকি ব্যাগটা।
সে বছর বর্ষাকালটা ছিল ভীষণ জাঁকালো। দিনরাত একটানা বৃষ্টি হতো। এমনই এক বৃষ্টির দুপুরে হরিপদবাবুর ব্যাগে একটা চিঠি আসে। প্রেরকের নাম ছিল না, শুধু প্রাপকের জায়গায় লেখা ছিল—"সুরমা দেবী, বকুলতলা লেন"।
সুরমা ছিল এই গ্রামেরই এক মুখচোরা, শান্ত মেয়ে। তার বাবা ছিলেন গ্রামের প্রাথমিক বিদ্যালয়ের শিক্ষক। সুরমার বিয়ের কথা চলছিল কলকাতার কোনো এক পাত্রের সাথে। কিন্তু সুরমা যে গোপনে কাউকে ভালোবাসত, সেটা গ্রামের অনেকেই আন্দাজ করত।
হরিপদবাবু যখন চিঠিটা নিয়ে সুরমাদের বাড়ি পৌঁছান, তখন চারদিক নিস্তব্ধ। বাড়ির দরজায় একটা বড় তালা ঝুলছিল। প্রতিবেশীদের জিজ্ঞেস করে জানতে পারলেন, আগের রাতেই সুরমার বাবা সপরিবারে গ্রাম ছেড়ে চলে গেছেন। কলকাতার পাত্রের সাথেই নাকি তড়িঘড়ি করে বিয়ে ঠিক হয়েছে। কোথায় গেছেন, তার কোনো ঠিকানা কেউ দিতে পারল না।
হরিপদবাবু চিঠিটা ফেরত পাঠাতে পারতেন। কিন্তু তাঁর মনে হয়েছিল, এই চিঠির ভেতরে এমন কিছু আছে যা হয়তো সুরমার জীবনের সবচেয়ে বড় সত্য। তিনি চিঠিটা নিজের কাছে রেখে দিলেন। ভাবলেন, একদিন না একদিন সুরমা নিশ্চয়ই ফিরে আসবে এই গ্রামে।
 ২. সময়ের স্রোত
দিন যায়, মাস যায়, বছর ঘোরে। হরিপদবাবুর মাথার চুল সাদা হয়। গ্রামের মেঠো পথ পিচঢালা রাস্তায় রূপ নেয়। মানুষের হাতের চিঠির জায়গা দখল করে নেয় মোবাইল ফোনের মেসেজ আর কল। বকুলতলার ডাকঘরটা একসময় বন্ধই হয়ে যায়। কিন্তু হরিপদবাবুর অপেক্ষা শেষ হয় না।
প্রতিদিন বিকেলে তিনি বকুলতলায় এসে বসেন। যদি কোনোদিন কোনো অচেনা মুখ এসে দাঁড়ায় তাঁর সামনে!
আজও বিকেলটা একটু মেঘলা। মেঘের ডাক শুনে হরিপদবাবু দীর্ঘশ্বাস ফেলে ভাবলেন, "সুরমা, তুমি কি আর কোনোদিন ফিরবে না?"
এমন সময় একটি রিকশা এসে থামল বকুলতলার সামনে। রিকশা থেকে নামল এক তরুণী। জিন্স আর ফতুয়া পরা, কাঁধে একটা আধুনিক ব্যাগ। কিন্তু তার মুখের আদলে, বিশেষ করে চোখের চাউনিতে এমন কিছু ছিল যা হরিপদবাবুকে এক ঝটকায় পঞ্চাশ বছর পেছনে ফিরিয়ে নিয়ে গেল।
তরুণীটি চারদিকটা একটু দেখে নিয়ে হরিপদবাবুর দিকে এগিয়ে এল। মৃদু হেসে জিজ্ঞেস করল, "আচ্ছা দাদু, আপনি কি বলতে পারেন এখানে দেবেন্দ্রনাথ সেনের বাড়িটা ঠিক কোথায় ছিল?"
দেবেন্দ্রনাথ সেন—তিনিই ছিলেন সুরমার বাবা!
হরিপদবাবুর বুকটা ধক করে উঠল। তিনি কম্পিত গলায় জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি... তুমি কে মা?"
মেয়েটি হাসল, "আমি অনন্যা। দেবেন্দ্রনাথ সেন আমার দাদামশাই ছিলেন। আর আমার দিদিমার নাম সুরমা দেবী। দিদিমা মাসখানেক আগে মারা গেছেন। মারা যাওয়ার আগে তিনি আমাকে এই গ্রামের কথা বলেছিলেন। তাঁর খুব ইচ্ছে ছিল জীবনের শেষ দিনগুলোতে একবার এই গ্রামে আসার, কিন্তু শরীর সায় দেয়নি। তাই আমি তাঁর কিছু স্মৃতি খুঁজতে এখানে এসেছি।"
 ৩. বৃত্ত সম্পূর্ণ হওয়া
হরিপদবাবুর চোখে জল এসে গেল। তিনি পকেট থেকে সেই হলদেটে, জীর্ণ খামটি বের করলেন। পঞ্চাশ বছর ধরে পরম যত্নে আগলে রাখা চিঠি।
তিনি চিঠিটি অনন্যার দিকে বাড়িয়ে দিলেন। বললেন, "মা, এই চিঠিটা তোমার দিদিমার। আজ থেকে ঠিক পঞ্চাশ বছর আগে এই চিঠিটা তাঁর নামে এসেছিল। আমি তাঁর কাছে এটা পৌঁছে দিতে পারিনি। আজ আমার ছুটি হলো।"
অনন্যা অবাক হয়ে চিঠিটি হাতে নিল। খামের ওপরের লেখাটা দেখেই তার চোখ জলসজল হয়ে উঠল। সে অস্ফুটে বলল, "এটা... এটা আমার দাদামশাইয়ের হাতের লেখা নয়। দিদিমার ডায়েরিতে আমি ঠিক এই হাতের লেখার কিছু চিঠি দেখেছিলাম। এটা নিশ্চয়ই তাঁর সেই হারিয়ে যাওয়া মানুষের চিঠি, যার জন্য তিনি সারাজীবন গোপনে চোখের জল ফেলেছেন।"
অনন্যা চিঠিটি বুকের কাছে চেপে ধরল। তারপর হরিপদবাবুর পা ছুঁয়ে প্রণাম করে বলল, "ধন্যবাদ দাদু। আপনি শুধু একটা চিঠি নয়, আমার দিদিমার জীবনের সবচেয়ে বড় একটা টুকরোকে বাঁচিয়ে রেখেছিলেন।"
হরিপদবাবু বকুলগাছের গায়ে হেলান দিয়ে বসলেন। এক অদ্ভুত শান্তি তাঁর সারা শরীরে ছড়িয়ে পড়ল। মেঘ কেটে গিয়ে বিকেলের শেষ সূর্যকিরণ এসে পড়ল তাঁর হাসিমুখে। আজ সত্যিই তাঁর জীবনের শেষ চিঠিটা সঠিক ঠিকানায় পৌঁছে গেছে।

ছোট গল্প....নীল খামের রহস্য

  নীল খামের রহস্য

— একটি অনির্বাণ সেনের গোয়েন্দা গল্প

সেদিন সন্ধে থেকেই কলকাতায় ঝুম বৃষ্টি নামছিল। গোয়েন্দা অনির্বাণ সেন তার বৈঠকখানায় বসে আয়েশ করে লবঙ্গ চায়ে চুমুক দিচ্ছিল। আমি, অর্থাৎ তার সহকারী বিপ্লব, জানলার বাইরে ল্যাম্পপোস্টের আবছা আলোর দিকে তাকিয়ে ভাবছিলাম, এমন একটা বৃষ্টিভেজা রাতে একটা জমাটি কেস এলে মন্দ হতো না।

ঠিক তখনই দরজার কলিংবেলটা বেজে উঠল।

আমি দরজা খুলতেই ভেতরে প্রবেশ করলেন এক ভদ্রলোক। তাঁর পরনের রেনকোটটা জল ঝরিয়ে একাকার। ভদ্রলোকের বয়স পঞ্চাশের কাছাকাছি, চোখে তীব্র আতঙ্ক। অনির্বাণ সোফা থেকে উঠে দাঁড়িয়ে বলল, "আসুন, ভেতরে আসুন। আমি অনির্বাণ সেন। আর ইনি আমার বন্ধু বিপ্লব।"

ভ ভদ্রলোক সোফায় বসে নিজেকে কিছুটা সামলে নিয়ে বললেন, "আমার নাম সোমনাথ চৌধুরী। বালিগঞ্জের চৌধুরী ম্যানশনের মালিক। আমি এক মস্ত বিপদে পড়ে আপনার কাছে এসেছি, মিস্টার সেন।"

"কী হয়েছে খুলে বলুন," অনির্বাণ শান্ত গলায় বলল।

সোমনাথবাবু পকেট থেকে একটা প্লাস্টিকের প্যাকেট বের করলেন। তার ভেতর থেকে বেরোল একটি নীল রঙের খাম। তিনি বললেন, "আজ সকালে আমার ঠিকানায় এই চিঠিটা এসেছে। কোনো ডাকটিকিট নেই, কেউ এসে লেটারবক্সে ফেলে গেছে।"

অনির্বাণ প্যাকেট থেকে সাবধানে নীল খামটি বের করল। খামের ভেতরে একটুকরো সাদা কাগজ, যাতে টাইপ করা হরফে লেখা:

> "আগামী অমাবস্যার রাতে চৌধুরী ভিলার রাজকীয় মুঘল স্বর্ণমুদ্রা তার আসল মালিকের কাছে ফিরে যাবে। ক্ষমতা থাকলে বাঁচান।"

অনির্বাণ ভুরু কুঁচকে বলল, "মুঘল স্বর্ণমুদ্রা? সম্রাট আকবরের আমলের সেই বিখ্যাত মোহরটি, যা আপনার পূর্বপুরুষরা পেয়েছিলেন?"

"হ্যাঁ," সোমনাথবাবু মাথা নাড়লেন। "সেটি আমাদের পারিবারিক সিন্দুক, যা একটি অতি আধুনিক ইলেকট্রনিক লকার, তাতে রাখা থাকে। লকারের কোড শুধু আমি আর আমার বিশ্বস্ত ম্যানেজার সুবীর ছাড়া কেউ জানে না। আগামীকালই অমাবস্যা। আমি ভীষণ আতঙ্কে আছি।"

অনির্বাণ একটু হাসল। "চৌধুরী মশাই, আপনি কোনো চিন্তা করবেন না। আগামীকাল রাতে আমি আর বিপ্লব আপনার বাড়িতে ছদ্মবেশে উপস্থিত থাকব। দেখা যাক, এই রহস্যময় চোরের হাত কত লম্বা।"

 চৌধুরী ম্যানশনে অমাবস্যার রাত

পরদিন রাতে আমরা যখন বালিগঞ্জের চৌধুরী ম্যানশনে পৌঁছালাম, তখন চারদিক নিস্তব্ধ। আকাশ মেঘলা, যেন যেকোনো সময় ঝড় নামবে। সোমনাথবাবু আমাদের তাঁর খাস কামরায় নিয়ে গেলেন, যেখানে সেই বিশাল লোহার সিন্দুকটি রাখা ছিল। ঘরের জানলাগুলোয় লোহার শক্ত গ্রিল লাগানো, আর ঘরের বাইরে দুজন সশস্ত্র পুলিশ পাহারা দিচ্ছে।

ঘরে উপস্থিত ছিলেন সোমনাথবাবু নিজে, তাঁর ম্যানেজার সুবীর বাবু (যিনি কিছুটা গম্ভীর প্রকৃতির মানুষ), এবং সোমনাথবাবুর ভাইপো রজত।

অনির্বাণ লকারটি ভালো করে পরীক্ষা করে দেখল। তারপর ঘরের দেওয়ালে ঝুলতে থাকা একটা প্রাচীন ঘড়ির দিকে তাকিয়ে বলল, "রাত এখন এগারোটা বেজে চল্লিশ। অমাবস্যার তিথি শুরু হতে আর কুড়ি মিনিট বাকি।"

হঠাৎ একটা প্রবল শব্দে বজ্রপাত হলো, আর সেই মুহূর্তেই গোটা বাড়ির বিদ্যুৎ চলে গেল! ঘর অন্ধকার হয়ে গেল।

"সুবীর, জেনারেটরটা চালু করো!" সোমনাথবাবু চিৎকার করে উঠলেন।

সুবীরবাবু পকেট থেকে টর্চ বের করে ঘর থেকে বেরিয়ে গেলেন জেনারেটর ঘরের দিকে। প্রায় দুই মিনিট পর জেনারেটর চালু হলো এবং আলো ফিরে এল।

কিন্তু আলো আসতেই ঘরে যা দেখলাম, তাতে আমাদের সবার রক্ত হিম হয়ে গেল।

সিন্দুকের ভারী দরজাটা খোলা! আর তার ভেতরের মখমলের বাক্সটি খালি! সম্রাট আকবরের সেই ঐতিহাসিক স্বর্ণমুদ্রা গায়েব!

সোমনাথবাবু মাথায় হাত দিয়ে বসে পড়লেন, "সব শেষ! পুলিশ বাইরে পাহারা দিচ্ছিল, ঘরের দরজা বন্ধ ছিল, তবে চোর ঢুকল কী করে?"

রজত উত্তেজিত হয়ে বলল, "আমি বলছিলাম না জ্যাঠামশাই, পুলিশের ওপর ভরসা করা ভুল হয়েছে!"

অনির্বাণ কিন্তু শান্ত রইল। সে সিন্দুকের কাছে গিয়ে মেঝের দিকে তাকাল। মেঝেতে কয়েক ফোঁটা জলের দাগ। সে ঘরের এক কোণে রাখা ছাতাগুলোর দিকে তাকাল। ম্যানেজার সুবীরবাবু ঠিক তখনই ঘরে ফিরে এলেন। তার হাতে একটা ভেজা ছাতা।

অনির্বাণ বলল, "চৌধুরী মশাই, চোর বাইরে থেকে আসেনি। চোর এই ঘরের ভেতরেই ছিল এবং সে চুরির পর ঘর থেকে চুরির মাল বাইরে পাচার করতে পারেনি।"

"তার মানে?" রজত অবাক হয়ে প্রশ্ন করল।

অনির্বাণ সুবীরবাবুর দিকে এগিয়ে গেল। "সুবীরবাবু, জেনারেটর চালু করতে যাওয়ার সময় আপনার হাতে এই ছাতাটি ছিল না। কিন্তু আসার সময় আপনি ছাতাটি নিয়ে এসেছেন কেন?"

সুবীরবাবু তোতলানো গলায় বললেন, "বাইরে... বাইরে বৃষ্টি হচ্ছিল জেনারেটর ঘরে যাওয়ার সময়..."

"মিথ্যে কথা!" অনির্বাণ ধমক দিয়ে উঠল। "প্যাসেজ দিয়ে জেনারেটর ঘরে যেতে কোনো খোলা আকাশ পার হতে হয় না। আসলে, বিদ্যুৎ চলে যাওয়ার ঠিক আগের মুহূর্তে আপনি সিন্দুকের পাশে দাঁড়িয়েছিলেন। বিদ্যুৎ চলে যেতেই আপনি সিন্দুকটি খোলেন। আগে থেকেই কোডটি আপনার জানা ছিল। মুদ্রাটি নিয়ে আপনি প্যাসেজে রাখা নিজের এই ভেজা ছাতাটির ভেতরে লুকিয়ে ফেলেন। ভেবেছিলেন, পরে সুযোগ বুঝে ছাতা নিয়ে বেরোনোর সময় মুদ্রাটি পাচার করে দেবেন।"

"প্রমাণ কী?" সুবীরবাবু চিৎকার করে উঠলেন।

অনির্বাণ সুবীরবাবুর হাত থেকে ছাতাটি ছিনিয়ে নিয়ে সজোরে মেঝেতে ঝাড়ল। সঙ্গে সঙ্গে কালো ছাতার ভেতরের খাঁজ থেকে ঝনঝন শব্দে ছিটকে পড়ল উজ্জ্বল এক সোনার মুদ্রা! সম্রাটের সিলমোহর খোদাই করা সেই ঐতিহাসিক স্বর্ণমুদ্রা!

সোমনাথবাবু ও রজত বাকরুদ্ধ হয়ে দাঁড়িয়ে রইলেন। সুবীরবাবু মেঝের দিকে তাকিয়ে হাঁটু গেড়ে বসে পড়লেন।

বাইরে তখন পুলিশের গাড়ি এসে দাঁড়িয়েছে। অনির্বাণ চায়ের কাপে শেষ চুমুক দিয়ে আমার দিকে তাকিয়ে বলল, "কী হে বিপ্লব, বৃষ্টিভেজা রাতের কেসটা কেমন জমল?"

আমি হেসে বললাম, "একদম খাঁটি সোনার মতো, অনির্বাণ!"


ছোট গল্পঃ.....নীল ডায়েরির রহস্য

 

নীল ডায়েরির রহস্য

কলমে: জেমি


 ১. অসময়ের অতিথি

কলকাতার ক্রিক লেনের দোতলার ফ্ল্যাটটিতে তখন সবে সন্ধ্যার অন্ধকার নামতে শুরু করেছে। বাইরে টিপটিপ করে বৃষ্টি পড়ছে, সঙ্গে হালকা ঠান্ডা হাওয়া। গোয়েন্দা অনিমেষ রায় তাঁর আরামকেদারায় বসে পাইপ ধরিয়েছেন। উল্টো দিকের সোফায় বসে ল্যাপটপে কী একটা কাজ করছিল তাঁর তরুণ সহকারী দীপ্তেন্দু।
হঠাৎ কলিং বেলটা বেজে উঠল। এই অসময়ে আর এমন দুর্যোগে কে আসতে পারে, তা নিয়ে দুজনের মনেই কৌতূহল জাগল। দীপ্তেন্দু গিয়ে দরজা খুলতেই ঘরে প্রবেশ করলেন মাঝবয়সী এক ভদ্রলোক। তাঁর পরনে দামী কিন্তু কিছুটা ভিজে যাওয়া কোট, চোখে চশমা এবং মুখের অভিব্যক্তিতে স্পষ্ট ভয়ের ছাপ।
ভদ্রলোক ঘরে ঢুকেই বললেন, "আমার নাম হিমাংশু চৌধুরী। আমি খুব বিপদে পড়ে আপনার কাছে এসেছি, মিস্টার রায়।"
অনিমেষবাবু শান্ত গলায় বললেন, "বসুন মিস্টার চৌধুরী। আগে একটু সুস্থির হোন। দীপ্ত, ওনাকে এক কাপ গরম চা দিতে বলো।"
হিমাংশু চৌধুরী সোফায় বসে চশমাটা মুছে নিলেন। তারপর বলতে শুরু করলেন, "আমি পেশায় একজন প্রত্নতাত্ত্বিক। গত সপ্তাহে আমি পুরুলিয়ার একটা পুরোনো রাজবাড়ির ধ্বংসাবশেষ থেকে একটা অত্যন্ত প্রাচীন নীল রঙের চামড়ায় বাঁধানো ডায়েরি উদ্ধার করি। ডায়েরিটি কোনো সাধারণ মানুষের নয়, সেটি ছিল অষ্টাদশ শতাব্দীর এক কুখ্যাত ডাকাত সর্দার রঘুনাথ রায়ের। লোকশ্রুতি আছে, রঘুনাথ তাঁর সমস্ত লুঠ করা ধনসম্পদ একটা গোপন জায়গায় লুকিয়ে রেখেছিলেন, আর সেই জায়গার নকশা সংকেত হিসেবে লেখা আছে এই নীল ডায়েরিতে।"
অনিমেষবাবু পাইপে একটা টান দিয়ে বললেন, "আকর্ষণীয়! তা সেই ডায়েরিটি এখন কোথায়?"
হিমাংশু চৌধুরীর গলা কেঁপে উঠল, "সেটাই তো সমস্যা। গতকাল রাতে আমার লেক গার্ডেন্সের বাড়ি থেকে ডায়েরিটি চুরি হয়ে গেছে। শুধু তাই নয়, আজ সকালে আমি এই চিঠিটা পেয়েছি।"
তিনি পকেট থেকে একটি ভাঁজ করা কাগজ বের করে অনিমেষবাবুর দিকে এগিয়ে দিলেন। কাগজে লাল কালিতে বড় বড় অক্ষরে লেখা ছিল:
> *"ডায়েরির আশা ছেড়ে দাও চৌধুরী। বেশি বাড়াবাড়ি করলে তোমার জীবন প্রদীপ চিরতরে নিভে যাবে।"*
>
 ২. ঘটনাস্থল পরিদর্শন
পরদিন সকালে বৃষ্টি থামতেই অনিমেষ ও দীপ্তেন্দু হিমাংশু বাবুর লেক গার্ডেন্সের বাড়িতে পৌঁছাল। বাড়িটি বেশ বড় এবং চারপাশটা গাছপালায় ঘেরা। হিমাংশু বাবুর পড়ার ঘরটি ছিল দোতলায়।
অনিমেষবাবু ঘরের চারপাশটা খুব খুঁটিয়ে দেখতে লাগলেন। ঘরের জানলাগুলো ভেতর থেকে বন্ধ ছিল, কেবল একটি জানলার কাচ ভাঙা।
"চোর কি এই জানলা দিয়েই ঢুকেছিল?" দীপ্তেন্দু জিজ্ঞেস করল।
অনিমেষবাবু ভাঙা কাচের টুকরোগুলো পরীক্ষা করে বললেন, "না দীপ্ত। কাচের টুকরোগুলো ঘরের বাইরে পড়ে আছে। তার মানে জানলাটি ঘরের ভেতর থেকে ভাঙা হয়েছে, বাইরে থেকে নয়। চোরকে বোঝাতে হতো যে সে জানলা ভেঙে ঢুকেছে। আসলে চোর ঘরের চাবি দিয়েই ঢুকেছিল।"
"তার মানে ঘরের চাবি যার কাছে থাকে, সেই এই কাজের সঙ্গে যুক্ত?" দীপ্তেন্দুর চোখ চকচক করে উঠল।
"একদম ঠিক," অনিমেষবাবু বললেন। "মিস্টার চৌধুরী, আপনার এই ঘরে আর কার কার যাতায়াত আছে?"
হিমাংশু বাবু একটু ভেবে বললেন, "আমার ব্যক্তিগত সচিব প্রণব, আর আমার ভাগ্নে অর্ক। অর্ক ইদানীং শেয়ার বাজারে অনেক টাকা লোকসান করেছে বলে খুব টাকার শান্তিতে আছে।"
অনিমেষবাবু প্রণব এবং অর্ক—দুজনকেই ডেকে পাঠালেন।
প্রণব বাবু অত্যন্ত ভদ্র এবং শান্ত স্বভাবের মানুষ। তিনি জানালেন, চুরির রাতে তিনি নিজের বাড়িতেই ছিলেন। অন্যদিকে অর্ক কিছুটা উদ্ধত। সে বলল, "মামা তো সবসময় ওইসব পুরোনো আজেবাজে জিনিস নিয়ে থাকেন। আমার ওসব ডায়েরি নিয়ে কোনো মাথাব্যথা নেই।"
কিন্তু অনিমেষের তীক্ষ্ণ নজর এড়াল না যে অর্কর হাতের তালুতে একটা সদ্য কেটে যাওয়ার দাগ রয়েছে, যা ব্যান্ডেজ দিয়ে ঢাকা।
 ৩. সংকেতের খোঁজ
অনিমেষবাবু অর্কর হাতের ক্ষত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতেই সে কিছুটা থতমত খেয়ে বলল, "ও কিছু না, কাল রান্নাঘরে একটা কাচের গ্লাস ভেঙে হাত কেটে গেছে।"
তদন্ত শেষে বাড়ি ফেরার পথে অনিমেষবাবু চুপ করে রইলেন। দীপ্তেন্দু জিজ্ঞেস করল, "কী বুঝলেন স্যার? অর্কই কি চোর?"
"অর্ক সন্দেহভাজন ঠিকই, কিন্তু প্রমাণ ছাড়া কিছু বলা যাচ্ছে না। তাছাড়া ডায়েরিটা চুরি করার পর চোর নিশ্চয়ই পুরুলিয়ার সেই গুপ্তধনের সন্ধানে রওনা দেবে। আমাদেরও পুরুলিয়া যেতে হবে, দীপ্ত," অনিমেষ রায় মৃদু হেসে বললেন।
হিমাংশু বাবুর কাছ থেকে আগেই ডায়েরির কিছু পাতার ছবি নিজের ফোনে তুলে রেখেছিলেন অনিমেষবাবু, যা হিমাংশু বাবু উদ্ধার করার দিন তুলেছিলেন। গাড়িতে যেতে যেতে অনিমেষবাবু সেই ছবিগুলো দেখছিলেন।
ডায়েরির একটি পাতায় লেখা ছিল:
*"মহাবীরের চোখের আলো যেখানে প্রথম পড়ে, ঠিক তার দশ কদম পূর্বে কালভৈরবীর মন্দির। মন্দিরের গর্ভগৃহে শিবলিঙ্গের নিচে শায়িত আছে মহাকালের সম্পদ।"*
অনিমেষবাবু স্বগতোক্তি করলেন, "মহাবীর... চোখের আলো... কালভৈরবী। হুম, সংকেতটা বেশ জটিল।"
৪. পুরুলিয়ার জঙ্গলে
পরদিন ভোরেই অনিমেষ, দীপ্তেন্দু এবং হিমাংশু বাবু পুরুলিয়ার জয়চণ্ডী পাহাড়ের পাদদেশে এসে পৌঁছালেন। হিমাংশু বাবু ডায়েরিটি যে প্রাচীন দুর্গের ধ্বংসাবশেষ থেকে পেয়েছিলেন, সেটি জঙ্গলের বেশ গভীরে।
পুরোনো দুর্গের সামনে এসে অনিমেষবাবু চারপাশটা পর্যবেক্ষণ করতে লাগলেন। সেখানে একটি বিশাল হনুমান (মহাবীর) মূর্তি খোদাই করা ছিল পাথরের গায়ে।
"দীপ্ত, এখন সকাল আটটা। দেখো তো সূর্যের আলো হনুমানজির চোখের ওপর পড়ছে কি না," অনিমেষবাবু নির্দেশ দিলেন।
দীপ্তেন্দু দেখল, সকালের কাঁচা রোদ ঠিক হনুমান মূর্তির চোখের ওপর প্রতিফলিত হয়ে সামনের একটি প্রাচীন পাথরের স্তূপের ওপর গিয়ে পড়ছে।
"স্যার! ওই দেখুন, আলোটা ওই পাথরের ওপর পড়েছে!" দীপ্তেন্দু চিৎকার করে উঠল।
"চমৎকার! ওটাই হলো 'মহাবীরের চোখের আলো'। এবার ওখান থেকে ঠিক দশ কদম পূর্বে চলো," অনিমেষবাবু বললেন।
তাঁরা মেপে মেপে দশ কদম পূর্ব দিকে যেতেই একটি প্রাচীন, প্রায় ধ্বংস হয়ে যাওয়া মন্দিরের প্রবেশদ্বার দেখতে পেলেন। মন্দিরের দরজার ওপরে ক্ষয়ে যাওয়া খোদাইয়ে লেখা ছিল 'কালভৈরবী মন্দির'।
তাঁরা মন্দিরের ভেতরে প্রবেশ করতেই দেখতে পেলেন এক কোণে মাটি খোঁড়া হয়েছে। আর সেখানে দাঁড়িয়ে আছে একজন মানুষ, যার হাতে সেই নীল ডায়েরি এবং একটি চাড়ানি (খোঁড়ার যন্ত্র)। সে আর কেউ নয়—হিমাংশু বাবুর ব্যক্তিগত সচিব প্রণব!
তার পাশে দাঁড়িয়ে ছিল অর্ক, কিন্তু তার হাত দড়ি দিয়ে বাঁধা এবং মুখে টেপ লাগানো।
 ৫. রহস্যের সমাধান
প্রণব তাঁদের দেখে চমকে উঠল এবং পকেট থেকে একটা পিস্তল বের করে অনিমেষবাবুর দিকে তাক করল।
"খবরদার! কেউ এক পা-ও এগোবেন না। এই গুপ্তধন এখন আমার!" প্রণব চিৎকার করে বলল।
অনিমেষবাবু অত্যন্ত শান্ত গলায় বললেন, "প্রণব বাবু, পিস্তলটা নামিয়ে দিন। পুলিশ ইতিমধ্যেই এই জঙ্গল ঘিরে ফেলেছে। আপনি পালাতে পারবেন না।"
আসলে পুরুলিয়া পৌঁছানোর আগেই অনিমেষবাবু স্থানীয় পুলিশ প্রশাসনকে জানিয়ে রেখেছিলেন। ঝোপের আড়াল থেকে পুলিশ অফিসাররা রাইফেল তাক করে বেরিয়ে আসতেই প্রণব অস্ত্র ফেলে দিয়ে হাঁটু গেড়ে বসে পড়ল।
দীপ্তেন্দু তাড়াতাড়ি গিয়ে অর্কর মুখের টেপ খুলে দিল এবং তার বাঁধন কেটে দিল।
অর্ক হাঁপাতে হাঁপাতে বলল, "মামা, আমাকে ক্ষমা করে দাও। আমি শেয়ার বাজারে ঋণের জন্য প্রণবদার কাছ থেকে টাকা ধার নিয়েছিলাম। প্রণবদা আমাকে বলেছিল ডায়েরিটা চুরি করে দিলে আমার সব ঋণ মকুব করে দেবে। কিন্তু আমি যখন বুঝতে পারি ও তোমাকে ক্ষতি করতে চায়, আমি রাজি হইনি। ও তখন আমাকে জোর করে ধরে এখানে নিয়ে আসে।"
হিমাংশু বাবু অর্ককে জড়িয়ে ধরলেন।
দীপ্তেন্দু জিজ্ঞেস করল, "কিন্তু স্যার, আপনি কী করে বুঝলেন যে চোর অর্ক নয়, প্রণব বাবু?"
অনিমেষবাবু হেসে বললেন, "খুব সহজ, দীপ্ত। অর্কর হাতের কাটা দাগটা দেখে আমি প্রথমে ভেবেছিলাম ও জানলার কাচ ভেঙে ডায়েরি চুরি করেছে। কিন্তু পরে বুঝলাম, জানলাটি ভেতর থেকে ভাঙা হয়েছিল প্রণব বাবুর চুরির নাটক সাজানোর জন্য। অর্কর হাত কেটেছিল আসলে প্রণব বাবুর সঙ্গে ধস্তাধস্তির সময়, যখন সে ডায়েরিটা প্রণবের হাত থেকে কেড়ে নিতে চেয়েছিল। প্রণব বাবু জানতেন হিমাংশু বাবুর আসল চাবির গোছা কোথায় থাকে। আর তাছাড়া, হিমাংশু বাবুর ঘরের টেবিল থেকে শুধু ডায়েরি নয়, একটি দামী ফাউন্টেন পেনও চুরি গিয়েছিল, যা আমি আজ সকালে প্রণব বাবুর বুক পকেটে গোঁজা অবস্থায় দেখেছি।"
প্রণব বাবু মাথা নিচু করে রইলেন। পুলিশ তাঁকে গ্রেপ্তার করল।
অনিমেষবাবু মাটি থেকে নীল ডায়েরিটি তুলে হিমাংশু বাবুর হাতে দিয়ে বললেন, "আপনার আমানত আপনার কাছেই রইল মিস্টার চৌধুরী। তবে এবার এটা কোনো সরকারি জাদুঘরে জমা দিয়ে দেওয়াই বুদ্ধিমানের কাজ হবে।"
হিমাংশু বাবু কৃতজ্ঞতায় হাত জোড় করলেন।
পশ্চিমের আকাশে তখন সূর্য অস্ত যাচ্ছে। জয়চণ্ডী পাহাড়ের বুকে দাঁড়িয়ে অনিমেষ রায় তাঁর পাইপে আর একটা টান দিয়ে বললেন, "চলো দীপ্ত, এবার কলকাতায় ফিরে এক কাপ জমিয়ে চা খাওয়া যাক।"

ছোট গল্পঃ ....শৈশব

 নিঝুম রাতের নীরবতা ভেঙে আচমকা একটা শব্দ হলো। মেঘলা ধড়ফড় করে বিছানায় উঠে বসল। ঘড়ির কাঁটায় তখন রাত ঠিক তিনটে।

বাইরে ঝুম বৃষ্টি হচ্ছে, আর সেই সাথে ঝোড়ো হাওয়া। জানালার কাঁচগুলো বাতাসে থরথর করে কাঁপছে। মেঘলা ভাবল হয়তো জানালার পাল্লাই বাতাসে বাড়ি খাচ্ছে। সে বিছানা থেকে নেমে পায়ে পায়ে জানালার দিকে এগিয়ে গেল। কিন্তু জানালার কাছে পৌঁছানোর আগেই তার পায়ের পাতা কেমন যেন ভিজে উঠল।

মেঝেতে হাত দিয়ে মেঘলা দেখল, চারদিক জলে ভেসে যাচ্ছে। কিন্তু অদ্ভুত ব্যাপার, জলটা জানালা দিয়ে আসছে না। জলটা আসছে ঘরের ঠিক মাঝখান থেকে, যেন মেঝে ফুঁড়ে কোনো অদৃশ্য উৎস থেকে জল বেরোচ্ছে!

ভয়ে মেঘলার বুক ঢিপঢিপ করতে লাগল। সে টেবিল ল্যাম্পটা জ্বালাতে গেল, কিন্তু বিদ্যুৎ নেই। মোবাইলের ফ্ল্যাশলাইটটা অন করতেই তার চোখ চড়কগাছ!

মেঝের জলটা সাধারণ জল নয়—একেবারে স্বচ্ছ, নীলচে রঙের। আর সেই জলের ওপর ভেসে আছে ছোট ছোট কাগজের নৌকা। প্রতিটা নৌকায় নিখুঁত অক্ষরে কিছু একটা লেখা। মেঘলা কাঁপতে কাঁপতে একটা নৌকা তুলে নিল। আলো ফেলে দেখল, সেখানে লেখা:

> *"তুমি কি ভুলে গেছো মেঘলা? আজ তোমার সেই হারিয়ে যাওয়া শৈশব ফিরে এসেছে।"*

মেঘলার মনে পড়ে গেল, ঠিক পনেরো বছর আগে আজকের এই বৃষ্টির রাতেই সে তার প্রিয় খেলনা আর ডায়েরিটা একটা বাক্সে ভরে মাটির নিচে লুকিয়ে রেখেছিল, এক ভারী বৃষ্টির বন্যায় যা ভেসে গিয়েছিল।

সে চমকে উঠে দেওয়ালের দিকে তাকাল। জলের আয়নায় তার নিজের ছায়ার বদলে দেখা যাচ্ছে আট বছরের এক ছোট্ট মেয়েকে, যে খিলখিল করে হাসছে আর তার দিকে হাত বাড়িয়ে ডাকছে।

মেঘলার ভয়টা এক নিমেষে কেটে গিয়ে এক অদ্ভুত শান্তিতে মনটা ভরে গেল। সে মুচকি হেসে জলের ওপর বসে পড়ল, আর আলতো করে একটা কাগজের নৌকা ভাসিয়ে দিল স্মৃতির টানে।

গল্পটি কেমন লাগল? 

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